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Sunday, March 20, 2022

एक दोपहर

एक सुस्त दोपहर
लेटे थे हम बिस्तर पर
करने को थोड़ा आराम
कि तभी अचानक से, श्रीमान,
फ़ोन हमारा चीखा चिल्लाया,
किसी का बुलावा था आया।
बन्द पलकों के साथ ही हमने हाथ बढ़ाया,
फ़ोन को उठाकर कानों से लगाया,
और बेज़ार सी आवाज़ में फ़रमाया,
"हैलो।"


एक पल का था सन्नाटा,
और इसके पहले की हमारा मुँह खुल पाता,
एक मीठी वाणी का उस ओर उद्गम हुआ
जैसे अमृत और मधु का सङ्गम हुआ,
अवश्य ही वह कोई अप्सरा थी जिसका पृथ्वी पर जनम हुआ।
वैसे तो हम खुश ही हैं ,
लेकिन उस पल अपने विवाहित होने का हमें थोड़ा सा ज़रूर ग़म हुआ। 


खैर सपनों की दुनिया से खुद को निकाला,
अपनी बची-खुची जवानी को सम्भाला,
अपनी भावनाओं को कर के कण्ट्रोल,
अपनी उम्र के तराज़ू में शब्दों को तोल,
जैसे-तैसे हिम्मत जुटाए,
उन मोहतरमा से हम फ़रमाये,
"कहिये, मैं क्या मदद कर सकता हूं आपकी?" 


"जी मैंने सुना है कि आप पीएचडी के छात्र है,
और वाकई प्रशंसा के पात्र हैं,
पर हमने भी पीएचडी के देखें हैं ख़्वाब,
यह निर्णय सही है या ख़राब,
ऐसे ही कुछ प्रश्नों के पाने थे जवाब,
इसीलिए आपको कॉल किया है जनाब।"


बस उसी क्षण हुई स्वप्न-नगरी ध्वस्त,
हौसले हुए पस्त,
आँखों के आगे दुःख के बादल मण्डराये,
और हम असलियत में वापस लौट आये।
बोले, "बहन... अब आपको क्या बताएं,
अपनी कहानी कहां से सुनाएं"


आईआईएम का कैम्पस स्वस्थ्य का बाज़ार है,
यहां आते ही व्यक्ति हो जाता वेट-लॉस का शिकार है,
जो खा लेता इसकी मेस में एक बार है,
उसे हो जाता फिटनेस से प्यार है। 


सच कहें तो आईआईएम ने हमें इतना प्यार सिखा दिया,
संवेदना क्या होती है यह भी दिखा दिया,
बेदिल हैं वो लोग जो कुत्तों को कैम्पस से हटवाते हैं,
भई, कुत्तों का मन रखने को महीने में एक-दो बार तो हम भी खुद को उनसे कटवाते हैं। 


मैंने कहा, "देवी जी।"
आईआईएम के पानी में इतनी प्यूरिटी है,
कि अच्छे-अच्छों को मिल जाती मैच्युरिटी है। 
हम  जब यहां आये थे अपना सामान लेके,
सर पे बालों की पूरी दूकान लेके,
पूरी पर्सनालिटी में ऐसे फेरबदल हो गए,
कि तीन साल में भैया से अङ्कल हो गए। 


मैडम जी, आईआईएम आस्था से ओत-प्रोत है,
भक्ति-भाव का अद्वितीय स्रोत है। 
ऐसे माहौल में पढ़ते हुए, 
वन-प्राणी वातावरण या स्वयं भगवान से लड़ते हुए,
जब आप कभी थक जाएँ,
पढ़-पढ़ के पक जाएं,
फिर भी न मिलेगा आराम है,
क्या कहें इतना सारा काम है,
कि नास्तिक को भी ईश्वर समरण आ जाते हैं,
प्रार्थना में स्वयं को हर क्षण पाते हैं। 


तो अब आप ही कहें, माय डिअर,
आपको सारे सङ्केत तो दिख रहे होंगे क्लियर। 
जब ऐसा हो निराला संस्थान,
तो कोई कितना करे उसकी महानता का बखान। 
स्वास्थय व प्रेम का वास्ता,
मैच्युरिटी और भगवान में आस्था,
यह आईआईएम इन सब का परम उदाहरण है,
मेरे यहां आने का, डार्लिंग, बस यही कारण है। 


फिर फ़ोन पर एक ख़ामोशी छायी,
कुछ समय के लिए कोई आवाज़ नहीं आयी,
फिर इसके पहले कि हम कुछ कह पाते,
कन्या से उसका नाम पता ही जान पाते,
उसने फ़ोन पटक दिया,
हमारे दोस्ती में बढ़ते हाथ को झटक दिया। 
खैर, हमने अपनी नज़र घुमाई,
अभी भी थी भरी दुपहरी छायी,
और लेटे-लेटे उसी बिस्तर पर,
फिर सो गए अपनी पलकें बन्द कर। 

Monday, August 15, 2011

Bharat Mata


उठो नींद से तुम नज़र तो घुमाओ
बुलाती हैं चिल्ला के कोई बचाओ

लुटी जा रही जिसकी इज्ज़त बेचारी
गुनाहों की तलवार पड़ी जिसपे भारी

ना बेटा ना बेटी न ही कोई आया
वो सोता रहा जिस किसी को बुलाया

ना देखी किसी ने नुमाइश कली की
जो नाज़-ओ-मोहब्बत से अब तक पली थी

ये बिखरते से सपने बिलखती सी आँहें
ये आँखें सिसकती सिमटती सी बाहें

जो कहती हैं अब ना नज़र मूँद देखो
छुपा प्यार दिल में कहीं ढूंढ देखो

ना जलने दो शैतान की आग में तुम
ना हो जाऊं इतिहास में मैं कहीं गुम

मैं धरती हूँ जिसपे तुम चलना थे सीखे
मैं बारिश हूँ जिसमें कई बार भीगे

मैं गोदी हूँ जिसमें तुम सर रख के सोये
मैं आँचल हूँ जिसमें तुम छुप कर थे रोये

वही माँ हूँ मैं जिसने तुमको संभाला
मोहब्बत और बलिदान से तुमको पाला

ये विनती है तुमसे ना मुंह फेर जाओ
बुलाती हूँ तुमको के मुझको बचाओ

Thursday, June 24, 2010

ख़ुशी का ग़म

होठों में मुस्कराहट है
आँखों में घुली शरारत है
फिरता दुनिया के मेले में
अपनी तो ऐसी आदत है

रस्ते में हमसफ़र मिले
हँसते हँसते हम संग चले
फैलाते बरसाते सदा
खुशियाँ जितनी हमको मिले

लेकिन जो कोई झांकता
दिल की गहराई मापता
टूटा फूटा सा कोने में
टुकड़ा मिलता एक ख्वाब का

चुभता दिल की दीवारों पर
कर देता घाव दरारों पर
जलता भुनता है दिल मेरा
रखा जैसे अंगारों पर

उम्मीद यही कि हट जाए
ये दर्द कभी तो घट जाए
हर चाह तेरी हर ख्वाब तेरा
दिल से मेरे अब मिट  जाए

ऐसे ही अब जी लेता हूँ
खुशियों से दिल भर लेता हूँ
और परदे में इन खुशियों के
अपने आंसूं पी लेता हूँ

Sunday, February 14, 2010

तमन्ना

सुहानी शाम के आँचल में
एक खूबसूरत से पल में
झुकी पलकों के परदों से स्वीकार कर ले
पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले


साँसों की महकती गर्मी से
होठों की सुलगती नरमी से
दिल के उजड़े उपवन में बहार कर ले
पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले


मीठी मीठी बातों में
लिए हाथ को हाथों में
शहद में घुली हंसी से इज़हार कर ले
पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले


जहां उसके नाम करूं
ज़िन्दगी तमाम करूं
मुझसे गर ज़िन्दगी में एक बार कर ले
पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले... ...झूठा ही सही

Monday, November 30, 2009

मैं जानूं ना

कैसे घटायें कोई बताये वज़न जो बढ़ता जाए
खाते नहीं हम शक्कर मिठाई फिर भी फरक न पाएं
मैं जानूं ना ...आ..आ..आ..
मैं जानूं ना

ह्म्म्म....मिलता जो फिर ना झड़े हमसे न जाने क्यूँ
बरसों तक ऐसे जुड़े हमसे न जाने क्यूँ
मोटापा ऐसा मिला हमसे न जाने क्यूँ
सदियों तक न बिछड़े हमसे न जाने क्यूँ...ऊँ ..ऊँ...ऊँ... ऊँ...


कैसे घटायें कोई बताये वज़न जो बढ़ता जाए
खाते नहीं हम शक्कर मिठाई फिर भी फरक न पाएं
मैं जानूं ना ...आ..आ..आ..
मैं जानूं ना


आ..आ..आ..
गोलाई में देखो
मेरे जो जम गया..आ
निकलता नहीं है
क्या करूं..
ओ.. ओ.. ओ..
जाने क्यूँ ना जाए
क्यूँ सताए बेवजह
मैं दिन भर भी
कसरत जो करूँ
डायटिंग कर के भी
फास्टिंग कर के भी
डम्बबेल वो भारी से
लिफ्टिंग कर के भी
न पिघले
हमसे न जाने क्यूँ

सदियों तक न बिछड़े हमसे न जाने क्यूँ...ऊँ ..ऊँ...ऊँ... ऊँ...


कैसे घटायें कोई बताये वज़न जो बढ़ता जाए
खाते नहीं हम शक्कर मिठाई फिर भी फरक न पाएं
मैं जानूं ना ...आ..आ..आ..
मैं जानूं ना


Monday, June 15, 2009

office की कुर्सी

सरक भी जाए जो ज़मीन
हिल जाए दुनिया सही
अपने दिल के अन्दर ही
डर अपना समेटे रहो
चाहे कुछ भी हो लेकिन
तुम कुर्सी पर बैठे रहो


घर जल्दी क्यों जाओगे
क्या घर संसार निभाओगे
परिवार का ग़म मत करना
आनंद यही पर लेते रहो
चाहे कुछ भी हो लेकिन
तुम कुर्सी पर बैठे रहो


जीना यही व मरना है
तुम्हें काम ही करना है
जीवन के भवसागर में
नाव करम की खेते रहो
चाहे कुछ भी हो लेकिन
तुम कुर्सी पर बैठे रहो


नौकरी का यही सिद्धांत है
तेरे भाग में एकांत है
इसी में अपना मोक्ष जान के
चिता समझ तुम लेटे रहो
चाहे कुछ भी हो लेकिन
तुम कुर्सी पर बैठे रहो

Wednesday, December 31, 2008

आकांक्षा

है हँसी बिखराती
ख़ुशी बरसाती
दुःख के अन्धकार में रौशनी फैलाती
रूप सुनहरा
पर मैं देख ठहरा
उसकी आँखों का सागर गहरा
कोई बात छुपाता
मैं जान पाता
गर मैं बस इतना समझ पाता
कि है वो क्या
जो दर्द भरा
उसके दिल की किताब में लिखा
पर मैं बेअकल
पड़ा निर्बल
हर कोशिश के बाद भी विफल
खड़ा हूँ आज
सुन ले आवाज़
अब तू ही खोल दे सारे राज़
ऐ मेरे खुदा
अब तू ही बता
कि आखिर मेरी आकांक्षा है क्या?

Wednesday, December 10, 2008

विश्वास - part 1

एक बार एक बेटी बोली
जाकर अपनी माता से
समझ न आये तुमसे पूछूँ
या पूछूँ विधाता से

पति स्वरूप में तुमने माता
ये कैसा उपहार दिया
जिसने जीवन का रस कोई
न ही सुख न प्यार दिया

नहीं कभी पूरी कर पाया
मेरी कोई आशा को
और न पाया समझ कभी वो
शादी की परिभाषा को

नहीं वो क्यों माँ ऐसे जैसे
प्रेमी मेरी सखियों के
यही सोच फिर गिर जाते हैं
आँसू मेरी अँखियों से

... to be continued

Sunday, September 28, 2008

तपस्या

जैसे धरती पर बाग़ तभी खिलता है
जब उसके सीने पर एक हल चलता है |
जिस तरह सोना बस वही निखरता है
अग्निपथ पर जो चलकर पिघलता है |

जैसे लोहा वही खड्ग बन पाता है
जो हथौडे की चोट पर पिटता है |
हीरे का चेहरा भी तभी चमकता है
जब एक चाकू की नोक पर कटता है |

जिस तरह अनाज वही रोटी बनता है
जो चक्की की भुजाओं में पिसता है |
वैसे ही मानव वही पाता सफलता है
जो कठिनाइयों की राह पर चलता है |

Sunday, July 20, 2008

अहंकार

वचन कटु घृणा भरे
शीलता नहीं व्यवहार में
अधीरता के वश में हो
स्वच्छता नहीं विचार में

प्रेम भावना दूर, पड़ा
द्वेष के अन्धकार में
जीवन का निर्माण किया
बस क्रोध के आधार पे

अकेला अपनों से भी दूर
पड़ जाता इस संसार में
मानव जो अपना जीवन
जीता है अहंकार में

Monday, May 12, 2008

संघर्ष

मार-पीट लातें-मुक्का
भरी भीड़ में खाते धक्का
कभी यहाँ सरक कभी वहाँ हिला
मैं स्तब्ध खड़ा हूँ भौचक्का

ईश्वर तेरी क्या माया है
ये आज समझ में आया है
एक छोटे रेल के डब्बे में
सारा संसार समाया है

कुछ भी न मुझको सूझ रहा
मैं यही पहेली बूझ रहा
दरवाज़े पे क्यों लटक लटक
मानव मृत्यु से जूझ रहा

कैसी लीला तेरी भगवान्
निःशब्द देखता हूँ हैरान
हर दिन थोड़ा जीने को भी
थोड़ा थोड़ा मरता इंसान

Monday, April 21, 2008

मिलन घड़ी

भोर भयी फैला प्रकाश
मैं जगा लिए नयी एक आस
उठ गया आँख मलते मलते
यही सोचता था चलते चलते

आई होगी वो आज तो
दिखला दूंगा ये समाज को
हँसता था मुझपे जो कल तक
देखेगा उसकी एक झलक

कोई करता है मेरा ख़याल
करता है मेरी देख-भाल
शिकवा करता न गिला कोई
ऐसा मुझको भी मिला कोई

क्या आज वो मिलन घड़ी होगी
क्या वो उस पार खड़ी होगी
यूँ सोच विचार करते करते
सहमे सहमे डरते डरते

मैंने ईश्वर का नाम लिया
साँसों को और दिल थाम लिया
और फिर जो दरवाजा खुला…

Tuesday, April 01, 2008

उम्मीद

माना टूटा मेरा दिल है
सूनी दिल कि महफ़िल है
नामुमकिन नहीं ज़िन्दगी लेकिन
भले थोड़ी मुश्किल है


माना नहीं घर-बार है
ठोकरें भी लगातार हैं
नामुमकिन नहीं ठिकाना जब
आशियाना ये संसार है


माना नहीं कोई संग है
न ही जीवन में उमंग है
नामुमकिन नहीं खुशियाँ जब
गुलों में इतने रंग हैं


फिर जब पथरीली राह हो
ग़म में डूबी हर आह हो
मैं चलता रहूँ, बढ़ता रहूँ
क्यों दर्द की मुझे परवाह हो

Tuesday, October 09, 2007

भ्रमर

एक अनजान बगीचे में
पागल भ्रमर भ्रमण करता
मिलन सुन्दर कली का हो
बस यही आस क्षण क्षण करता


यौवन पंख उमंग सहित
उस प्रेमी ने उड़ान भरी
हर अंग अंग खिला फूलों का
खिल खिल कर मुस्कान भरी


आलिंगन पर उन पुष्पों का
न उसके मन को था भाया
प्रेम-वश था विवश भ्रमर के
दिल में इक सुन्दर काया


मदमस्त भ्रमर वो मन मेरा
तरसे है प्रेम कली पावन
रंग भर दे सुन्दरता जिसकी
मोहित कर दे मेरा जीवन

Tuesday, February 27, 2007

Night-out song

नींद आ रही है
मुझे नींद आ रही है
नींद आने से
थक जाने से
उबासी आ रही है

कल भी मैं न सोया
और आज भी सो न पाऊंगा
ऑफिस में रहूँगा
घर वापस जा न पाऊंगा

नाईट आऊट मारूं
काम से हारूं
उदासी छा रही है

नौकरी करते करते
मैं तो सोना ही भूल गया
अब ऐसे दिन बीते
खाना पीना भी भूल गया

दिल बहलाऊं
और समझाऊं
कमाई तो आ रही है

Monday, February 14, 2005

ek choti si prem kahani

liye gilaas haath mein
dekhe nazar bachaaye
ladkee jab koi paas se
hay! matakti jaaye

hay! matakti jaaye
hum dil ko ye samjhaaye
dekh ke mujh ko ek baar
vo muskaati jaaye

vo muskaati jaaye
nazar humse takraayee
dekh ke uska roop rang
dil ne li angdaayi

dil ne li angdaayi
ek josh humpe chaaya
pyaar ki duniyaa mein
humne kadam badhaaya

humne kadam badhaaya
ki jaa ke haath milayen
dil ki baatein bol kar
usko gale lagaayen

bas itna hi tha sochaa
ki apni kismat phooti
dekh ke uska boyfriend
saari himmat chooti

saari himmat chooti
ki uski aisi kaaya
jaise manush shareer mein
ho khud bheem samaaya

socha chalo chhod de
hum nahin naadaan
dil ke badale jaan ko
hum na kare kurbaan

bas yun hi...

abhi subah ka aalam tha ki abhi shaam dhal gayi
jane kab nazar ke saamne se zindagi nikal gayi

kaamyaabi chhoone ki jwala jo dil mein jagayi thi
sholo mein uski apnon ki yaadein jal gayi

sajaye the maine bhi sapno ke kai shandar mahal
khuli palak to khwabo ki duniya pighal gayi

manzile-kaamyaabi ki oar bhaag raha tha 'aks'
ki pairon ke neeche se zameen hi fisal gayi

Iltija

kya khauf hai tumko humse
kis baat se katraate ho
hum dosti ka haath badhate hain
tum haath jhatak kar jate ho

kuch aur nahi hai chaaha humne
fir kyun humse sharmaate ho
na kha jaayenge tumko hum
jo itna tum ghabraate ho.

gar baate ye itni galat hai to
kaan pakad khada ho jaunga
par haske tum do baat kaho
to khushh bada ho jaunga

Manzil...

zindagi ki nayi raah leke hulchul aayi hai
mujhe nazar mere saamne manzil aayi hai

tanhaiyon mein dube the dil ke sab armaan
lehron pe kashti khwabon ki machal aayi hai

bhatak raha tha main kin anjaan rahon par
vo kaun jo sahi raah par le chal aayi hai

nakamiyon ke veeraano ka mujhpe saaya tha
raah mein jeet ki ik shama jal aayi hai

kya kahe 'aks' us khuda ki meherbaani ka
khud uske dar se (meri) kismat badal aayi hai

home sweet home

jab shaam ka ghana saaya pada
rah mein liye suitcase khada
ek lift ki taak mein rah to taktey
kabhi aage to kabhi peeche jhaanktey

aankhon mein ek chamak si thi
hoton ki muskurahat bejhijhak si thi
na koi ticket na koi plan bada
suitcase mein jaane kya saamaan pada

bas utha liye jo aaya haath mein
jo dikha use le chala saath mein
ab to ghar jaa ke hi aaraam hoga
teen dino se pehle na koi kaam hoga

ye haath na ruke ye kadam na toote
aisa sunahara mauka na choote
nikal pada bina kuch soche
koi fikr nahi ki koi kya pooche

India-Australia ka koi match tha
dekhne walo ke man mein romanch tha
kintu use chhodne ka bhi koi gham na tha
ab itna sab sochne ka bhi dam na tha

ban gayi suhaani vo shaam thi
kaam ki bediyon se aazaadi ke naam thi
saath mere Ramji ka saath tha
mere sir par unka unka jo haath tha.